सोनिया मिश्रा
चमोली। रक्षाबंधन के पर्व पर उत्तराखंड के चमोली जिले की उर्गम घाटी में स्थित भगवान बंसी नारायण के प्राचीन मंदिर में आस्था का अनूठा संगम देखने को मिलता है। समुद्र तल से करीब 12 हजार फीट की ऊंचाई पर हिमालय की कंदराओं और हरे-भरे बुग्यालों के बीच स्थित इस धाम में वर्षभर में केवल रक्षाबंधन के दिन ही विशेष मेले का आयोजन होता है। इस दिन दूर-दराज के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान नारायण के दर्शन के लिए पहुंचते हैं और उन्हें राखी अर्पित करते हैं।
मान्यता है कि रक्षाबंधन से एक दिन पहले कलगोठ गांव के ग्रामीण मंदिर पहुंचकर भगवान बंसी नारायण को घी, मक्खन, सत्तू आदि का भोग लगाते हैं। रक्षाबंधन के दिन कलगोठ गांव के ग्रामीण युवाओं की ओर से श्रद्धालुओं के लिए भंडारे का आयोजन भी किया जाता है।

राजा बलि से जुड़ी है रक्षाबंधन की मान्यता
बंसी नारायण मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यता भगवान विष्णु और राजा बलि की कथा से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी। राजा बलि ने अपना सर्वस्व दान कर दिया और तीसरे पग के लिए अपना सिर भगवान के सामने कर दिया। भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राजा बनाया।
कथा के अनुसार, राजा बलि ने भगवान विष्णु से अपने द्वारपाल के रूप में रहने का आग्रह किया। जब माता लक्ष्मी को इसका पता चला तो नारद मुनि ने उन्हें रक्षाबंधन के दिन राजा बलि को राखी बांधने का उपाय बताया। इसी पौराणिक मान्यता से बंसी नारायण में रक्षाबंधन के दिन भगवान को राखी अर्पित करने की परंपरा को जोड़ा जाता है।

चतुर्भुज विष्णु प्रतिमा है विराजमान
बंसी नारायण नाम से भले ही भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी का आभास होता हो, लेकिन मंदिर में भगवान विष्णु की चतुर्भुज प्रतिमा विराजमान है। मंदिर परिसर में गणेश, भैरव, कुबेर, घंटाकर्ण और वन देवियों की मूर्तियां भी स्थापित हैं।
प्राचीन मंदिर की स्थापत्य शैली को कत्यूरी शैली से जोड़ा जाता है। कल्पेश्वर के निकट और पंचकेदार क्षेत्र के मध्य स्थित यह धाम हिमालय के अत्यंत शांत और निर्जन क्षेत्र में है। यहां कोई स्थायी बस्ती नहीं है, जिसके कारण मंदिर का वातावरण तपस्थली जैसा प्रतीत होता है।
पांडवों की तपस्थली से भी जुड़ी मान्यता
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस क्षेत्र का संबंध पांडवों की तपस्या से भी रहा है। भगवान विष्णु की लीलास्थली माने जाने वाले इस क्षेत्र के आसपास कल्पेश्वर और रुद्रनाथ जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल स्थित हैं। ऊंचे हिमालय, दूर तक फैले बुग्याल और प्राकृतिक सौंदर्य श्रद्धालुओं के साथ पर्यटकों को भी आकर्षित करते हैं।
कई गांवों से पहुंचते हैं श्रद्धालु
रक्षाबंधन के अवसर पर डुमक, कलगोठ, पल्ला, किमाणा, उर्गम, ल्यांरी-थैणा, भेंटा, भरकी, पिलखी और अरोसी सहित आसपास के क्षेत्रों से लोग बंसी नारायण पहुंचते हैं। श्रद्धालु भगवान नारायण को राखी अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
पैदल सफर के बाद पहुंचता है बंसी नारायण धाम
बंसी नारायण पहुंचने के लिए उर्गम घाटी से होकर जाने वाला मार्ग बेहद खूबसूरत है। कल्पेश्वर के दर्शन के बाद गीरा, वांसा, उर्वशी आश्रम, मूला बुग्याल, कुडमूला और वरजिक होते हुए देवदर्शनी पार कर मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। देवग्राम से यह दूरी लगभग 10 से 12 किलोमीटर बताई जाती है।

दूसरा मार्ग उर्गम से पल्ला, जखोला, किमाणा और कलगोठ होते हुए बंसी नारायण तक जाता है। यह मार्ग करीब 16 किलोमीटर का है, जिसमें लगभग 10 किलोमीटर वाहन और छह किलोमीटर पैदल सफर करना पड़ता है। सड़क की स्थिति को देखते हुए वर्तमान में उर्गम से यात्रा करना अपेक्षाकृत सुविधाजनक बताया जाता है।
देवग्राम उर्गम में यात्रियों के ठहरने के लिए होम स्टे की सुविधा उपलब्ध है। सामाजिक कार्यकर्ता एवं जनदेश के सचिव लक्ष्मण सिंह नेगी ने बताया कि रक्षाबंधन के दिन बंसी नारायण में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और ग्रामीणों की ओर से उनकी सेवा के लिए भंडारे का आयोजन किया जाता है।
हिमालय की गोद में 12 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित बंसी नारायण धाम में रक्षाबंधन का यह वार्षिक मेला सदियों पुरानी आस्था, पौराणिक परंपरा और ग्रामीण संस्कृति का अनूठा संगम है।




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