“मेरी मैत की ध्याणी, तेरू बाटू हेरदू रौंदू…” — कैलाश की ओर रवाना हुई मां नंदा की डोली

सोनिया मिश्रा 

चमोली। लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर चमोली मां नंदा के जयकारों, जागरों और लोकगीतों से नंदामय हो उठा है। आज से सिद्धपीठ कुरुड़ मंदिर से मां नंदा की राजजात यात्रा शुरू हो गई। इस दौरान विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद मां नंदा की तीनों डोलियां कैलाश धाम की ओर रवाना हुईं।

विदाई के इस भावुक क्षण में ध्याणियों और श्रद्धालुओं की आंखें नम हो उठीं। लोकगीतों, जागरों, झोड़ा-चांचरी और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के बीच पूरा कुरुड़ क्षेत्र भक्तिमय नजर आया। कुरुड़ से बधाण, दशोली और बंड क्षेत्र की नंदा डोलियां अपने-अपने पारंपरिक मार्गों से आगे बढ़ते हुए एक निर्धारित मार्ग पर मिलेंगी। यात्रा के दौरान अलग-अलग गांवों में देवी की डोली का स्वागत, पूजा-अर्चना और रात्रि प्रवास होगा।

12 सितंबर को रामणी में विभिन्न देव डोलियों और छंतोलियों का मिलन होगा। इसके बाद यात्रा आला, कनोल होते हुए आगे बढ़ेगी। 15 सितंबर को वाण में लाटू देवता के मंदिर में डोली का प्रवास होगा, जहां विभिन्न क्षेत्रों से आई देव डोलियों का मिलन भी विशेष आकर्षण रहेगा।

इसके बाद यात्रा हिमालय के दुर्गम और ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर बढ़ेगी। 18 सितंबर को वेदनी बुग्याल में नंदा सप्तमी की विशेष पूजा होगी। 19 सितंबर को यात्रा पातर नचौणियां, कैलवा विनायक, रूपकुंड, ज्यूंरागली और शिलासमुद्र जैसे दुर्गम पड़ावों से होकर गुजरेगी।

20 सितंबर को शिलासमुद्र से पंचगंगा होते हुए होमकुंड पहुंचकर मां नंदा की विशेष पूजा-अर्चना और हवन होगा। यहीं मां नंदा के प्रतिनिधि माने जाने वाले चौसिंग्या खाडू को कैलाश की ओर विदा किया जाएगा। मान्यता है कि यात्रा का यह चार सींग वाला मेढ़ा देवी का मार्गदर्शक होता है और होमकुंड पहुंचने के बाद इसे देवी की सामग्री के साथ अकेले कैलाश की ओर रवाना किया जाता है।

होमकुंड में पूजा के बाद यात्रा वापसी के मार्ग पर लौटेगी और विभिन्न पड़ावों से होते हुए सितंबर के अंत तक अपने निर्धारित धामों में पहुंचेगी। इस दौरान पहाड़ के गांवों में नंदा के जागर, लोकगीत और पारंपरिक नृत्य-संगीत की स्वर लहरियां इस पूरी यात्रा को धार्मिक आस्था के साथ-साथ उत्तराखंड की लोकसंस्कृति का भी जीवंत उत्सव बना देंगी।

नंदा देवी राजजात क्या होती है?

नंदा देवी राजजात उत्तराखंड की प्राचीन धार्मिक, सांस्कृतिक और लोकपरंपरा से जुड़ी हिमालयी यात्रा है। इसमें मां नंदा को पहाड़ की बेटी मानकर उनके मायके से कैलाश स्थित ससुराल की ओर विदा किया जाता है। यात्रा में विभिन्न गांवों और क्षेत्रों की देव डोलियां व छंतोलियां शामिल होती हैं। यात्रा का प्रमुख पड़ाव होमकुंड है, जहां विशेष पूजा के बाद मां नंदा को कैलाश की ओर विदाई दी जाती है। इसे अक्सर “हिमालय का महाकुंभ” भी कहा जाता है।

क्यों होती है राजजात?

मां नंदा देवी राजजात 12 वर्ष के अंतराल पर आयोजित होने वाली उत्तराखंड की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक यात्रा है। लोकमान्यता में मां नंदा को पहाड़ की बेटी माना जाता है, जो मायके से कैलाश स्थित ससुराल के लिए विदा होती हैं। 12 वर्ष बाद होने वाली इस यात्रा में विभिन्न क्षेत्रों की देव डोलियां और श्रद्धालु शामिल होते हैं। होमकुंड में पूजा के बाद चौसिंग्या खाडू को कैलाश की ओर विदा किया जाता है।

लोकजात और राजजात में अंतर

मां नंदा की लोकजात मुख्यतः स्थानीय स्तर पर आयोजित होने वाली यात्रा है, जिसमें गांवों और क्षेत्रीय श्रद्धालुओं की भागीदारी होती है। इसके विपरीत, राजजात व्यापक और विशेष धार्मिक यात्रा है, जिसमें उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों की देव डोलियां और छंतोलियां शामिल होती हैं। राजजात कुरुड़ से होमकुंड तक माना जाता है और चौसिंग्या खाडू की कैलाश विदाई इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।

चौसिंग्या खाडू क्या होता है?

चौसिंग्या खाडू यानी चार सींग वाला मेढ़ा, नंदा देवी राजजात की सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक है। मान्यता के अनुसार इसे मां नंदा का प्रतिनिधि और यात्रा का मार्गदर्शक माना जाता है। राजजात में यह श्रद्धालुओं के साथ हिमालय के होमकुंड तक जाता है। वहां विशेष पूजा के बाद इसे मां नंदा की भेंट और श्रृंगार सामग्री के साथ कैलाश की ओर विदा किया जाता है।

खास बात: चार सींग वाला मेढ़ा सामान्यतः दुर्लभ माना जाता है, इसलिए इसके प्रकट होने को भी धार्मिक दृष्टि से विशेष माना जाता है।

कितने पड़ाव होते हैं?

आम तौर पर यात्रा को लगभग 19–20 प्रमुख पड़ाव/चरणों में बताया जाता है। प्रमुख स्थानों में नौटी, कांसुवा, सेम, कोटी, भगोती, नंदकेसरी, वाण, गैरोली पातल, वेदनी बुग्याल, पातर नचौणियां, कैलवा विनायक, रूपकुंड, ज्यूंरागली, शिलासमुद्र और होमकुंड शामिल हैं।

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